About the Book: इतिहास अक्सर बादशाहों की तलवारों, उनकी जीतों और उनकी भव्य इमारतों का लेखा-जोखा बनकर रह जाता है। लेकिन उन ऊंची दीवारों के पीछे, महलों की ढलती शामों में और पुद्ध के मैदानों की धूल के नीचे कुछ ऐसी कहानियां दबी रह जाती है, जिन्हें कहना तो था, मगर जिन्हें बड़ी चतुराई से छुपा दिया गया।
यह कहानी किसी सल्तनत की जीत की गाथा नहीं है, बल्कि उस अहसास की है जो वक्त के साथ बदला। यह कहानी है आरिफ हकीम की, जो महज बारह वर्ष की उम्र में एक अनजानी कशिश और मजबूरी के तहत बाबर के काफिले का हिस्सा बना। वह लड़का, जिसने न केवल मुगल साम्राज्य की नींव पड़ते देखी, बल्कि उस नींव में दफन हर दर्द और क्रूरता को महसूस किया।
आरिफ हकीम से शुरू हुआ यह सफर उसके पोते अनवर तक पहुंचता है, जब फतेहपुर सीकरी की गलियाँ बौरान होने लगती हैं। यह २८० बरसों का वह अनकहा सच है, जिसे इतिहासकार लिखना अक्सर भूल जाते हैं।
यह कहानी एक गवाह है उन आँखों की बिन्होंने तख्त बदलते देखे और उन रूहों की. जिसने हर दौर की कड़वाहट और मिठास को पिया। आइए, इतिहास के उस बंद दरवाजे को खोलते हैं जहाँ आरिफ और अनवर हमारी इंतजार कर रहे हैं।