आचार्य चतुरसेन शास्त्री के विशाल कथा-साहित्य में 'नीलमणि' एक विशिष्ट स्थान रखती है। यह उपन्यास शास्त्री जी की उस अद्भुत कला का उदाहरण है जिसमें वे इतिहास, कल्पना और मानवीय भावनाओं को एक सूत्र में पिरो देते हैं। 'नीलमणि' मुख्य रूप से समर्पण, प्रेम और राजसी मर्यादाओं के बीच झूलती एक मर्मस्पर्शी कहानी है। आचार्य चतुरसेन ने इसमें नारी के हृदय की कोमलता और उसकी अडिग शक्ति का चित्रण किया है। उपन्यास के केंद्र में ऐसे पात्र हैं जो अपने कर्तव्यों और अपनी भावनाओं के बीच निरंतर संघर्षरत रहते हैं। श्नीलमणिश् शब्द स्वयं में बहुमूल्य और दुर्लभ होने का प्रतीक है, जो पात्रों के व्यक्तित्व की शुद्धता को दर्शाता है। प्रमुख विशेषताएँ - ऐतिहासिक पुटः अपनी अन्य रचनाओं की तरह, इसमें भी चतुरसेन जी ने एक विशेष कालखंड का वातावरण तैयार किया है, जो पाठक को उस युग के वैभव और संघर्ष का साक्षात अनुभव कराता है। - नारी चेतनाः लेखक ने स्त्री पात्रों को केवल कोमल नहीं, बल्कि अत्यंत स्वाभिमानी और निर्णय लेने में सक्षम दिखाया है। प्रेम में त्याग की पराकाष्ठा इस उपन्यास का प्राण है। - साहित्यिक भाषाः पुस्तक की भाषा संस्कृतनिष्ठ और ओजपूर्ण है। लेखक क
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