काका हाथरसी ने अपने जीवनकाल में हास्यरस को भरपूर जिया था। वे और हास्य आपस में इतने घुलमिल गए हैं कि हास्यरस कहते ही उनका चित्र सामने आ जाता है। कविताओं के साथ-साथ व्यक्तिगत जीवन में और फिर व्यक्तिगत पत्रों में भी उनका वही परिहासप्रधान रूप जीवंत हो उठता है। इस पुस्तक में काका द्वारा निरंतर तीन दशक तक डा. गिरिराजशरण अग्रवाल और डा. मीना अग्रवाल को लिखे गए पत्रों में से कुछ महत्त्वपूर्ण पत्रों को प्रकाशित किया जा रहा है।
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