नीलम के शब्दों में ही कहूँ, 'उनका मन बड़ा बावरा है' उनके मन की संवेदनात्मक भावनाएँ, चाहे वे मुक्तछंद के रूप में हों, चाहे गीत, ग़ज़ल या हाइकु के रूप में, सब जगह धूमकेतु की तरह बिखरी दिखाई देती हैं। अंतर केवल इतना है कि धूमकेतु टूट कर अस्तित्वहीन हो जाता है पर नीलम की सृजन शक्ति का कमाल है कि उनके काव्य की हर पंक्ति एक ओर जहाँ हृदय को हिलोरित करती है, वहीं दूसरी ओर कुछ सोचने को विवश करती है। संक्षेप में कहें तो 'प्रिय कहो, कौनसा गीत सुनाऊँ?' कविता-संग्रह गागर में सागर के समान है जिसमें प्रकृति, प्रेम, विरह, संयोग, वियोग, भक्ति, दर्शन, आध्यात्म, सब समाहित है। पाठक अपनी रुचि के अनुसार मोतियों के इस भंडार में से अपना मनचाहा मोती खोज सकता है -पद्मश्री शीला झुनझुनवाला ******** 'प्रिय कहो, कौनसा गीत सुनाऊँ' आग्रह से भरा शीर्षक है। हर पाठक को आभास होगा कि उसी को इंगित कर न केवल पूछा रहा है, अपितु परोसा भी जा रहा है । सो मुझे भी लगा इतनी विधाएं देख कि कौन सा गीत सुना जाए क्षणिकाएं, मुक्तक, तांका, हाइकु, मोनोस्टिक हाइकु, मुक्तछंद, गीत, ग़ज़ल पूरा भंडार है- एक सम्पन्न सुलभ भंडार -हरीश नवल
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