जन्म से नहीं निर्माण से (Built, Not Born) में जयंत घोष जीवन की उस यात्रा को सामने रखते हैं, जहाँ इंसान धीरे-धीरे खुद को गढ़ता है- सफलता, विकास, समझ और अपने उद्देश्य की ओर बढ़ते हुए। वे कहते हैं कि ये सब किसी जन्मजात गुण से नहीं आता, बल्कि लगातार किए गए मानवीय श्रम से बनता है। जब हम अपने भीतर झाँकते हैं, अपने अंदर और बाहर के कामों में तालमेल बैठाते हैं, यह समझने लगते हैं कि कब 'हाँ' कहना है और कब 'ना', तभी हम अपने काम के अर्थ और उसके असर को साफ़-साफ़ देख पाते हैं। इसी से हमारे भीतर धैर्य, स्पष्टता, जिज्ञासा और एक तरह का साहस पैदा होता है। जयंत घोष के अनुसार, विकास कोई अलग से हासिल की जाने वाली चीज़ नहीं है, बल्कि वह तो अपने-आप घटता है- जब हम कठिन रास्तों पर चुपचाप, लगातार काम करना सीख लेते हैं। इस किताब के 20 अध्याय या कहें छोटे-छोटे जीवन-मंत्र और साथ में दिए गए अभ्यास हमें अपनी ही जीवन-यात्रा पर ठहरकर सोचने का मौका देते हैं और रोज़ थोड़ा-थोड़ा खुद को बनाने की प्रेरणा भी। इस पुस्तक के लिए ढेरों शुभकामनाएँ
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