वास्तव में संस्कृत व्याकरण के अध्ययन के बिना 'श्रीमद् भगवद् गीता' ग्रंथ को समझना बहुत कठिन है । ग्रंथ का सरल अर्थ समझने के लिए भी प्रत्येक श्लोक में आने वाले हर एक शब्द का स्वरूप समझना अत्यंत आवश्यक है । सामान्यतः किसी भी वाक्य में आने वाले शब्द - कर्ता, कर्म, करण, क्रियापद, अव्यय आदि रूप के होते हैं । इसमें 'क्रियापद' यह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण अंग है । क्योंकि, इस 'क्रियापद' के आधार पर ही कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, सम्बन्ध, अधिकरण आदि बातें होती हैं । श्रीमद् भगवद् गीता के श्लोकों में भी हमें क्रियापद मिलते हैं । श्लोक का केवल साधारण अर्थ ना देखकर; व्याकरण की दृष्टि से क्रियापदों का विचार करके, श्रीमद् भगवद् गीता का अध्ययन अधिक फलदायी बनाने के उद्देश्य से इस 'गीताक्रियापदानि' पुस्तक का निर्माण किया गया है । इस विषय पर समाज में उपलब्ध अन्य पुस्तकों की तुलना में इस पुस्तक में अधिक जानकारी प्रदान करने का प्रयास किया है । संस्कृत व्याकरण में प्रवेश करने की उम्मीद रखनेवाले, श्रीमद् भगवद् गीता का अध्ययन व्याकरण की दृष्टि से करनेवाले, इस ग्रंथद्वारा संस्कृत व्याकरण को पढ़नेवाले विद्यालयीन और महाविद्यालयीन विद्यार्थी तथा
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