पंडित गौरीदत्त द्वारा रचित ""देवरानी जेठानी की कहानी"" हिंदी साहित्य के शुरुआती उपन्यासों में से एक है, जो १८७० में प्रकाशित हुआ था। यह उपन्यास एक संयुक्त परिवार की कथा कहता है, जिसमें दो बहुओं - देवरानी और जेठानी के आपसी संबंधों, उनके बीच होने वाली ईर्ष्या, कलह और पारिवारिक जीवन पर उनके प्रभावों को मार्मिक ढंग से चित्रित किया गया है। यह कृति तत्कालीन समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों, रूढ़ियों और पारिवारिक संरचनाओं पर प्रभावशाली ढंग से प्रकाश डालती है। उपन्यास में स्त्रियों की स्थिति, शिक्षा का महत्व, और संयुक्त परिवार में आने वाली चुनौतियों को उजागर किया गया है। देवरानी और जेठानी के चरित्रों के माध्यम से लेखक ने नारी मनोविज्ञान और पारिवारिक रिश्तों की जटिलताओं को कुशलतापूर्वक दर्शाया है। ""देवरानी जेठानी की कहानी"" न केवल एक मनोरंजक कथा है, बल्कि यह उस समय के समाज का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है, जो हमें १९वीं सदी के भारतीय पारिवारिक जीवन और सामाजिक मूल्यों को समझने में मदद करता है। इसकी सरल भाषा और हृदयस्पर्शी कहानी इसे आज भी पठनीय और महत्वपूर्ण बनाती है यह कृति तत्कालीन समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों, रूढ़
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