यह निराला जी द्वारा रचित एक अत्यंत लोकप्रिय और यथार्थवादी रेखाचित्र (स्केच) है। इस कृति का मुख्य पात्र 'बिल्लेसुर' है, जो समाज के सबसे निचले तबके का प्रतिनिधित्व करता है। वह एक ब्राह्मण है, लेकिन गरीबी और परिस्थितियों के कारण वह बकरियाँ चराने का काम शुरू करता है, जिसके कारण उसका नाम 'बिल्लेसुर बकरिहा' पड़ जाता है। 1. सामाजिक विद्रूपताः निराला जी ने इसके माध्यम से ग्रामीण समाज में व्याप्त जातिवाद, पाखंड और रूढ़िवादिता पर तीखा व्यंग्य किया है। 2. आत्मनिर्भरता का संदेशः बिल्लेसुर का पात्र यह दिखाता है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और मेहनत के बल पर व्यक्ति अपनी नियति बदल सकता है। 3. भाषा शैलीः इसकी भाषा ठेठ ग्रामीण और व्यंग्यात्मक है, जो पाठक को हँसाती भी है और सोचने पर मजबूर भी करती है। यह पुस्तक केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस समय के ग्रामीण भारत की आर्थिक तंगहाली और मानवीय जिजीविषा का सजीव दस्तावेज है। निराला जी ने बहुत ही संजीदगी से एक साधारण बकरी चराने वाले को नायक के रूप में स्थापित किया है।
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