यह कृति, बैठक जारी है, नौ व्यंग - रचनाओं का संग्रह है। नाट्य रूप में गढ़ी गईं इन रचनाओं के पात्र यूं तो अति गम्भीर हैं पर ऊल-जलूल विचार सरणी के अंजान झूले में झूलते हुए वे सूक्ष्म, तीक्ष्ण और रस भरे हास्य का ताना-बाना बुनते रहते हैं। कहीं न पहुंचने की व्यथाओं से आप्त इन बैठकों की कीचड़ में लिपटे ये पात्र हास्य-व्यंग की नंग-धड़ंग बूंदें, पाठकों पर छींटने में बहुत कुशल हैं, हालांकि इन बेचारों को स्वयं इसका पता तक नहीं चलता। भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करतीं ये व्यंग-व्यथाएं जहां हास्य-सिक्त कटाक्षों एवं पैने संवादों की बहुरंगी कूचियों से पात्रों में प्राण फूंकती हैं वहीं अजीबो-गरीब तर्क में पारंगत हो चले इनके पात्र इन कथाओं के साथ अपेक्षित बेरहम न्याय करते हैं। यह दोतरफा आंतरिक संतुलन इन रचनाओं को पठनीय व सराहनीय बना गया है।
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