"भारत के इतिहास में खिलजी खानदान का शासन, काला, डरावना कालखंड रहा। जुल्म, हिंसा, लूटपाट, अत्याचार जोरों पर था। सत्ता और मजहब के नाम पर मनमानी चलती थी। ऐसे वातावरण में, अपने खुद के धर्म के बारे में, आत्मसम्मान का विचार करना भी संभव नहीं लगता था। मगर इस त्रासदी का विरोध करके, तथा अपने धर्म का भगवा झंडा फिर दिल्ली पर लहराने की मंशा, गुजरात की राजकन्या ने पूरी की थी।
अर्थात इस मुकाम पर पहुँचने के दौरान कई बार अपमान, अवहेलना झेलनी पड़ी। शारीरिक, मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा। जीना मुश्किल हो गया था। फिर भी उस पृथ्वीराज चौहान के बाद महज एक बरस के लिए क्यों नहीं, दिल्ली के तख्त को सिंहासन बनाया, भगवा फहराया। क्यों चाल चलनी पड़ी, गम-सहनशीलता बरकरार रखी। मगर अपनी इच्छा पर डटी रही।
ये आसान, सहज नहीं था। क्या किया ये सारा वर्णन इसमें बयाँ किया है।"