वास्तव में आज की दलित कहानी करूणा और आक्रोशी तेवर रखते हुए भी भारतीय जातिवाद की त्रासद स्वरूप को बेहद संजीदगी और रवानगी की चाशनी में डुबोकर यथार्थ की बारीक तह में जाकर रचनात्मकता की नई परिभाषा गढ़ लेती हैं। प्रस्तुत दलित कहानियां रचनाशीलता की एक ऐसी सच्ची दुनिया रचती हैं जिसमें मानवीय जीवन के लगभग हर रंग और मिज़ाज का वर्णन कुशलतापूर्वक हो सका है। इन कहानियों के चरित्र कहीं गैर दलितों के जातिवाद से सीधे-सीधे टकराते हुए नज़र आते हैं तो कहीं उनकी साजिशों, नफरतों और भ्रष्टाचारों का पर्दाफाश करते हुए नज़र आते हैं। इस कहानी संग्रह का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इसमें बड़ी संख्या में स्त्री दलित कहानीकार अपनी धारदार कहानियों के माध्यम से अपने साहित्यिक वजूद का निर्माण करती हैं। इनकी कहानियां दलित पितृसत्ता को बेनकाब करते हुए लिंग भेद के शोषण का निषेध करती हैं और समतामूलक समाज निर्माण की धारणा के प्रति आश्वस्त करती हैं। इस किताब में शामिल प्रत्येक कहानी अपनी रचनात्मकता के ऊर्जावान और बौद्धिक संपन्न होने का स्पष्ट संकेत देती है।
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