मानव सभ्यता के इतिहास में युद्ध सदैव केवल सीमाओं के विस्तार अथवा संकुचन की घटनाएँ नहीं रहे हैं। वे उन असंख्य मानवीय संवेदनाओं के विध्वंस की कथाएँ भी रहे हैं, जिनकी नींव पर समाज और संस्कृति का निर्माण होता है। जब दो राष्ट्र अपनी सीमाओं, महत्वाकांक्षाओं, अस्मिता और अहंकार की रक्षा के नाम पर युद्ध के मार्ग पर अग्रसर होते हैं, तब रणभूमि में केवल सैनिक ही नहीं उतरते; उनके साथ उतरती हैं लाखों उम्मीदें, असंख्य सपने और अनगिनत रिश्ते। युद्ध का पहला शिकार सत्य होता है और अंतिम शिकार मानवता।
"रक्तिम क्षितिज के उस पार" ऐसी ही एक मार्मिक, व्यापक और आत्ममंथन कराती हुई कहानी है, जो युद्ध की विभीषिका के बीच मनुष्य की संवेदनाओं, प्रेम, त्याग, पीड़ा और संघर्ष की कहानी कहती है। यह केवल दो देशों के बीच लड़े गए युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि उन करोड़ों साधारण लोगों की कहानी है, जिनका युद्ध से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता, फिर भी वे उसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं।
युद्ध की आग केवल सीमाओं को नहीं जलाती, वह मनुष्यता के भीतर बसे विश्वास को भी झुलसा देती है। एक ओर राष्ट्र गौरव, विजय और प्रतिशोध के नारों से आकाश गूँजता है, तो दूसरी ओर अस्पतालों में कर