सैकड़ो मील दूर से आती एक चमत्कारिक आवाज । सुकन्या की छाती फटी जा रही थी,वह मरी जा रही थी, उसका अस्तित्व समाप्त हुआ जाता था,प्रेम में,किसी को प्यार करने में । हर बार लगता था इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ । जीवन धन्य हो जाता था, उसका मनुष्य रूप में धरा पर जन्म लेना । कोई भी दिखाई नहीं देता था इस धरा पृष्ठ पर एक नारी और एक पुरुष को छोड़कर बाकी पूरी पृथ्वी बही जा रही थी । उसके माता-पिता थे, उसने एक दिन इस पृथ्वी पर जन्म लिया था, बड़ी होकर यौवन की दहलीज पर कदम रखा था । कुछ भी याद नहीं, उसके पति,संतान,स्वजन कोई भी नहीं । किसी की भी आवाज सुनाई नहीं देती थी। चारों ओर कोई भी नहीं केवल एक नारी और एक पुरुष के अलावा । सुकन्या और जीवन । वह योगिनी डोमी और जीवन उसका कालिदास, कान्हूपा, कन्हाई ।
'योगिनी की आत्मलिपि' एक रहस्य है । सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था । गाया गया संगीत भी बेसुरा हो सकता है। उज्वल आकाश मलिन दिखाई देता है। रास्ता नहीं मिलता । समस्त प्राप्ति और अप्राप्ति के बीच लीन हो जाती थी । सु - सुकन्या -सुकन्या कहां है ? सुकऱ्या कहाँ है।
लेखिका रश्मी राउल आज भी सुकन्या की खोज में है ।