'यादों में गौरैया' केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि हमारी लुप्त होती संवेदनाओं और व्यवस्था के खोखलेपन पर प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त' का एक अत्यंत तीखा और मर्मभेदी प्रहार है। कहानी एक नन्ही गौरैया के बहाने शुरू होती है, लेकिन देखते ही देखते सत्ता के गलियारों, स्वार्थी राजनेताओं और भ्रष्ट ठेकेदारों के उस तिलिस्म को बेनकाब कर देती है, जहाँ मासूमियत भी 'फंड' और 'घपलों' की भेंट चढ़ जाती है। महान व्यंग्यकारों की परंपरा को आगे बढ़ाता यह उपन्यास अपनी चुटीली भाषा और गहरे कटाक्षों से पाठक को भीतर तक झकझोरता है और एक चुभता हुआ सवाल छोड़ जाता है कि क्या विकास की इस अंधी दौड़ में हमने अपनी मनुष्यता खो दी है? यदि आप समाज की कड़वी सच्चाइयों को व्यंग्य के आईने में देखना चाहते हैं, तो यह कृति आपके संग्रह में अनिवार्य रूप से होनी चाहिए, क्योंकि यह गौरैया की तलाश नहीं, बल्कि हमारे अपने भीतर मरती संवेदनाओं की पुकार है।About the Author: डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त' हिंदी साहित्य जगत के एक प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, कवि और बाल साहित्यकार हैं। व्यंग्य के क्षेत्र में अपनी बेबाक और गहरी अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध डॉ उरतृप्त के लेख 'शिक्षक की म
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