'बातों और यादों' का सघन सम्बन्ध है। बातों में यादों का अस्तित्व रहता है और यादों में बातें समाहित रहती हैं। बातों से रिश्ते बनते हैं और बातों में रिश्ते खुलते हैं। रिश्ते मौन होते हैं। पर अपनी ध्यानस्थ अवस्था में वे आत्मीय संवाद रचते हैं। ऐसे अनुभव मात्र सम्पर्क से जन्म ही नहीं लेते, वे संस्कार, विचार और प्रज्ञा-जन्य भी होते हैं। स्मृतियाँ कभी लुप्त नहीं होती है बल्कि हमारी चेतना गहन में चली जाती है यह गहनता ही संलग्न व्यक्तित्वों का रचनात्मक उत्स है। जिनमें उनके जीवन के किन्ही पहलुओं का अविस्मरणीय रेखांकन है।
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