प्रस्तुत पुस्तक में रैदास जी के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण व चामत्कारिक प्रसंगों के अतिरिक्त वाणी भी दी गई है। तथा कुछ पदों की सरल व्याख्या भी की गई है, जिनके माध्यम से पाठकगण पदों का भाव जान सकते हैं। संतवाणी एक ऐसा अथाह सागर है, जिसमें जो जितना गहरा बैठता है, उतने ही मोती बटोर लाता है। मैंने भी इस वाणी रूपी सागर में पैठ कर अनमोल रत्न पाए और आपकी सेवा में प्रस्तुत कर दिए हैं। आशा करती हूँ कि आप भी इनका पूरा रसास्वादन करते हुए, कुछ गहन चेतनापरक व सार्थक विचार ले पाएँगे।
इस पुस्तक की रचना में अनेक लेखकों की कृतियों से सहायता प्राप्त हुई। इन कृतियों की सहायता के बिना रैदास-वाणी को समझ पाना असंभव-सा था। मैं उन सभी लेखकों का हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ, जिनमें से डॉ. रमेशचंद्र मिश्र (संत रैदास, वाणी और विचार), गोविन्द रजनीश (रैदास रचनावली), डॉ. शुकदेव सिंह (रैदास वानी) तथा इंद्रराज सिंह (संत रविदास) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।