यह कहानी बाल साहित्य की प्रमुख पत्रिका 'बालवाटिका' में प्रकाशित हुई तो इस पर पाठकों की बहुत आनंदपूर्ण प्रतिक्रियाएँ मुझे मिलीं। जयपुर से एक सहृदय पाठक का फोन आया, तो उन्होंने कहा, "मनु जी, कहानी पढ़कर मैं अपने आप को रोक नहीं पाया। ऐसी अनोखी कहानी लिखी है आपने, जैसी मैंने पहले कभी नहीं पढ़ी।... यह मोटे तौर से कोई पचास बरस लंबी मेरी कथा-यात्रा अभी तक जारी है, जिसमें मैंने जाने-अनजाने अपनी हँसी, अपने आँसू, अपने सपने और अपने सुख-दुख की इतनी बेचैन घड़ियाँ पिरो दी हैं, कि कोई चाहे तो इनमें मुझे और मेरी आत्मकथा को टटोलकर खोज सकता है। आगे शायद कुछ और भी ऐसी यादगार कहानियाँ आएँ जो आज के बचपन के साथ-साथ कहीं न कहीं खुद मेरे मन और जिंदगी से करीबी तौर से जुड़ी हों। या जिनमें जाने-अनजाने खुद मेरे भीतर का उल्लास और बेचैनियाँ भी शामिल हों। पाठकों के साथ-साथ खुद मुझे भी बड़ी उत्सुकता के साथ उनका इंतजार है।
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