लेखक की रजनीशपुरम यात्रा एक चमत्]कार थी।चमत्]कार थी चमत्]कार माने यही कि जो हर तरह से असंभव हो और संभव हो जाएं हां,न जाने को पैसा, न कुछ और पहुंच गया। न केवल पहुंचा, वरन ओशो के अतिथि की भांति देर तक रुके रहने का भी सौभाग्]य मिला। पर यह आधा सत्]य है। शेष आधा सत्]य यह है कि जो भी वहां गया या जो वहां कम्]यूनवासी की भांति रहा, रजनीशपुरम यात्रा ही नहीं, रजनीशपुरम नगर भी चमत्]कार से कम किसी के लिए नहीं था। वह युगों-युगों से ॠषियों-मुनियों द्वारा देखा गया सपना था जिसे ओशो ने साकार किया था। जैसे पानी में प्रवेश करने को कोई गीला हो जाता है, और अग्नि में कोई जल जाता है, वैसे रजनीशपपुरम में होकर कोई शांत, शीतल एवं उत्]सवपूर्ण हो जाता है।
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