अत्यंत सहज भाव से आपने आधुनिक समाज की विसंगतियों को उजागर किया है। इतना सहज भाव और ऐनी भेदक दृष्टि क्वचित कदाचित ही देखने को मिलती है। आपकी उपमाएं भी चड़ी बंधक हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी व्यंग्य में उन्होंने ताकालीन शिल्पयत एकरसता को तोड़कर उसे एक नयी दिशा दी खास तौर पर उनके पांच एब्सई उपन्यास कालजयी कृतियों के रूप में सामने आए। सुरेश काँत शिल्पात वैविध्य का हिन्दी व्यंग्य साहित्य में अभाव रहा है, परंतु इस अभाव को नरेन्द्र कोहली के व्यंग्य साहित्य ने तोड़ा है। -प्रेम जनमेजय प्रतीकात्मकता, विधायकता, तटस्थता, समग्र प्रभाव, समसामयिक समस्यात्मकता और संगम नरेन्द्र कोहली के व्यंग्य विधान में प्रभावक तत्त्व के रूप में विद्यमान दृष्टिगोचर होते हैं। -डॉ विवेकी राय
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