यह कृति 'मेरा बूढ़ा चाँद' अकेला जी की पाँचवीं काव्य-कृति है। इसके पूर्व गीत संग्रह 'आह' (1982), 'रुखसारों पर अटके मोती' (2021), 'चल अकेला' (2023), मुट्ठी भर राख (2024) और अब ये 'मेरा बूढ़ा चाँद' आपके हाथों में है। इन कृतियों का एक के बाद एक आना, न सिर्फ़ अकेला जी की सतत साहित्य-साधना का परिणाम है, बल्कि ये जनपद प्रतापगढ़ की साहित्य-परम्परा में और हिन्दी-साहित्य की गरिमामयी अजस्रधारा में एकान्त से निकले एक मन्दगति और निर्मल झरने का आकर मिल जाना है। अकेला जी उस दिये की तरह हैं जो किसी नदी के तट पर संध्याकाल के पश्चात जलता है। उस दिये का उद्देश्य अन्धकार को समाप्त करना नहीं होता, अपितु वह देखनेवालों को मनः शान्ति प्रदान करने के लिए जलता है। वह दिया घाट पर जलते समय जल में अपने प्रतिबिम्ब से प्रकाश फैलाकर अन्दर-बाहर कुल प्रकाशित कर देता है। बाहर के वातावरण में फैला प्रकाश तथा नदी के जल में प्रसरित द्रवीभूत प्रकाश किसी तिमिर-नाश के उद्देश्य की पूर्ति हेतु नहीं हैं, अपितु ये अन्तः और वाह्य को एक साथ आलोकित करने के लिए हैं। अकेला जी इधर बीच जिस विरह-अग्नि में अनवरत जले हैं, उसने इन्हें जलाकर राख नहीं किया, बल्कि किसी धातु की तरह पिघला दिया है। इनकी विरह-अग्नि से निकले
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