"खुद से वापस" कभी रात के तीन बजे - किसी का नाम ढूँढा है फ़ोन में - और फिर रख दिया हो? कभी भीड़ में खड़े होकर - इतना अकेला महसूस किया हो - कि साँस लेना मुश्किल लगे? कभी आईने के सामने खड़े होकर - ख़ुद को पहचाना न हो? अगर हाँ - तो यह किताब - तुम्हारे लिए लिखी गई है। "खुद से वापस" - एक ऐसे इंसान का सफ़र है जो मोहब्बत में सब कुछ दे बैठा - और जब वो मोहब्बत चली गई - तो ख़ुद को भी खो बैठा। यह किताब उस टूटन की कहानी है। उस सुन्नपन की - जब आँसू भी सूख जाते हैं। उस अकेलेपन की - जो हर भरी महफ़िल में साथ बैठा रहता है। पर यह सिर्फ़ दर्द की किताब नहीं है। यह उठने की किताब है। माफ़ करने की - ख़ुद को। जाने देने की - उसे। और सबसे ज़रूरी - ख़ुद से वापस आने की।
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