रचना का कथानक उदारीकरण से पूर्व का है। तीव्र जीवनशैली, उपभोक्ता संस्कृति तब तक लोकजीवन से नदारद थी। सो युवाओं को मन-रंजन के लिए व्यूह रचना की दरकार पड़ती थी। कथाभूमि मध्य हिमालय-शिवालिक के संधिस्थल पर बसे अंचल की है। लोक-संस्कृति, लोक व्यवहार व अपनेपन की झलक रचना में यत्र-तत्र दिखाई पड़ती है। घटनाक्रम लेखक के कैशोर्य-युवावस्था के संधिकाल का है; जो कुछ भी अनुभव किया, उसका यथार्थ चित्रण हुआ है। चित्रण जीवंत है, जिससे रचना असर पैदा करती है, चमत्कृत करती है। उसी साँचे को प्रस्तुत किया गया है, जिसमें ढलकर वह ऐसा बन पड़ा है। रचना उसी भावभूमि का विस्तार है।
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