भारतीय राष्ट्रवाद की भूमिका
'भारतीय राष्ट्रवाद की भूमिका' के चिंतनपरक, विचारोत्तेजक निबंध अपने अंदर ऐसे विषयों को समेटे हैं जो स्वयं भारतीय राष्ट्रवाद की भूमिका रचते हैं। इन निबंधों में गहन वैचारिकी का एक विस्तृत वर्णपट है। ये निबंध गहरी संवेदना और सरोकार के साथ लिखे गए हैं। इनमें लेखक का गहन अध्ययन और अन्वीक्षण और मीमांसा शक्ति परिलक्षित होती है। देश-दुनिया के संकटों पर लेखक दृष्टिपात ही नहीं करता बल्कि इनसे पार पाने का रास्ता भी सुझाता है।
भारतीय राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि और भूमिका पर विचार करते हुए लेखक इस नतीजे पर पहुंचता है कि अपने को एक और अक्षुण्ण रखकर ही भारत शेष विश्व को कुछ दे सकता है, और राष्ट्रवाद इसका एक व्यापक आधार प्रदान करता है। भारत के लिए राष्ट्रवाद का विचार कोई नया नहीं है, भारतीय राष्ट्र की यूरोपीय राष्ट्र राज्यों के साथ कोई तुलना नहीं हो सकती। यह कोई आत्मकेंद्रित अवधारणा नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक अभिव्यक्ति में भी यह मुक्तिकामी ही रहा है। इसकी सार्थकता सार्वभौमवाद को साकार करने में है 'राष्ट्र परिवार के आगे विश्व परिवार को संभव बनाने के लिए', अखिरकार हमारा विश्वबोध तो वसुधैव कुटुम्बकम म&