मैं और मेरा परिवार जीवन जीते समय जीवन में प्रेम, आनंद और सुख की तलाश में थे। इसके लिए बहुत मेहनत करते हुए पैसा कमाकर जीवन के सभी सुख- सुविधाओं के उपभोग के सोच -विचार में थे। इस सोच में ३७ साल की आयु बीत गई पर प्रेम, आनंद और सुख कहीं नहीं मिला । एक दिन बहुत सोचा और खुद के अंतर्मन से सवाल किया कि, सुख कहाँ है ? जवाब मिला- "" यदि सुख चाहिए तो आनंदित रहना होगा।"" फिर से मन को पूछा- ""आनंद कहाँ मिलेगा ?""प्रत्युत्तर मिला- "" आनंद चाइये तो स्वयं पर, लोगों पर, प्राणी मात्र पर तथा हर जीव पर प्रेम करना होगा।"" फिर मैंने क्या किया? खुद पर प्रेम करने लगा । मनुष्य मात्र पर, प्राणी मात्र पर प्रेम करने लगा। इससे मैं स्थायी रूप से आनंदित रहने लगा, इसलिए सुखी रहने लगा और मुझे सफलता प्राप्ति के रहस्य और गणित समझ में आने लगे । वे इस प्रकार प्रेम से, आनंद से, उत्कृष्ट प्रयत्न और काम करने से अपने और अपने परिवार के सपने, ध्येय पूरे होते हैं और पैसा अपने आप पीछे -पीछे चला आता है । यह जो मुझे समझ आया, वही मैं इस किताब के माध्यम से लोगों को सरल शब्दों में बता रहा हूँ । ""यदि यशोदायी सकारात्मक प्रेरणा देने vali इस किताब को जो कोई पढ़ेगा, स्वयं के अलावा दूसरों को, अन्य को भी सकारात्मक प्रेरणादायी
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