आधुनिक सभ्यता ने आज एक विश्व-सभ्यता का रूप धारण कर लिया है। यहूदी-ख्रिस्तीयन ज्ञान-परम्परा और पश्चिमीविज्ञान एवं तकनीकी के आपसी गठबन्धन से बनी और विकसित ज्ञान-परम्परा की यह आवश्यक साभ्यतिक परिणति है। जीवन और जगत् के दिव्य और दैवीयलंगरों को काटकर विश्व के उत्तरोत्तर लौकिकीकरण एवं निर्दैवीकरण की यह सार्वभौम योजनाहै। समूची दुनिया को इसके माध्यम से नेतृत्व मिले और पूरी मानव जाति को इस एकरेखीयजीवन-शैली में नियोजित करना इसका अघोषित लक्ष्य है। आधुनिकताकी इस साभ्यतिक कार्ययोजना में दुनिया की तमाम संस्कृति और सभ्यताएँ अपने-अपने घर-आँगन में ही अप्रासंगिक होती जा रही हैं। सम्प्रतिपूरी दुनिया में देशजता और स्वकीय ज्ञान-परस्पराओं के पुनराविष्कारऔर उनसे जुड़ने की जो चेतना दिखाई पड़ रही है, वह वास्तव में आधुनिक सभ्यता के वर्चस्वशाली पूर्वपक्ष की प्रतिक्रिया मेंउत्पन्न एक प्रतिचेतना ही है। भारत में यह प्रतिचेतना औपनिवेशिक आवरणों से आवृत, भारतीय ज्ञान-परम्परा के चराचर संवेदी, सर्वसमावेशी, जीवन्त और संवर्द्धनशील स्वरूप के अनावरण में फलितहो रही है। यह अपने को