ईसा से कोई छह सौ बरस पहले यूनान में एक गुलाम था। उसका नाम था ईसप। ईसप बड़ा बुद्धिमान और समझदार था आसपास की दुनिया को बड़े गौर से देखता था। उसने दास-प्रथा के जुल्म और अत्याचार देखे तो उसका हृदय फूट-फूटकर रो पड़ा। उसने कहा, 'दास भी मनुष्य हैं। उनके साथ पशुओं से बदतर व्यवहार क्यों किया जाता है?' ईसप के इन विचारों से नाराज होकर उसे बड़ी यातनाएँ दी गईं। उसे जेल में डाल दिया गया और बहुत बूढ़े होने पर उसे जेल से रिहा किया गया। तब तक वह महज हड्डियों का ढाँचा रह गया था, कमर और पीठ झुक गई थी। पर उसने अपनी अनुभवी आँखों से जो देखा, वह उसके भीतर गहरे उतरता गया और अनूठी कहानियों की शक्ल में ढल गया। ईसप गली-गली घूमकर बच्चों को ये कहानियाँ सुनाता, तो वे खुशी से भर उठते। वे कहानियाँ बच्चों से उनके माता-पिता और दूसरे लोगों तक पहुँचीं। ईसप की मृत्यु के बाद उन्हें पुस्तक रूप में सामने लाया गया। और फिर देखते ही देखते पूरी दुनिया में ये जा पहुँचीं। संसार की हर भाषा में इनका अनुवाद हुआ। साहित्य अकादमी के पहले बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित प्रकाश मनु बच्चों के प्रिय लेखक हैं। उन्होंने हिंदी में ईसप की ढेर सारी कहानियों को एक नए और खूबसूरत कलेवर में पेश कि
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