दयानंद वर्मा, जिन्होंने एक दशक तक 'प्रकाशित मन' जैसी सांस्कृतिक पत्रिका का संपादन किया है और सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व मनोवैज्ञानिक विषयों पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं, वर्मा जी की यह पुस्तक कहानियों के माध्यम से मानव स्वभाव को गहराई से समझने की सूझ देती है, जो व्यक्तिगत उन्नति की ओर ले जाने में सहायक है। ये कथाएँ आज की वैज्ञानिक उपलब्धियों का चित्रण तो करती हैं, पर साथ ही उनके खोखलेपन और विरोधाभासों को भी बेबाकी से उजागर करती हैं। यह पुस्तक 'बाजार' और मीडिया के सहयोग से प्रभावित हमारे आधुनिक समाज का यथार्थवादी दर्पण है। रोचकता इतनी है कि एक बार पढ़ना आरंभकरने पर इसे छोड़ने को जी न चाहेगा। ये कहानियाँ आपके होठों पर मुस्कान बिखेरने के साथ-साथ आपको जीवन और वर्तमान सामाजिक व्यवस्था पर गहन चिंतन के लिए विवश भी करेंगी।
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