एक ही घर में पले दो बेटे एक सफल, दूसरा खामोश। दिल्ली के बदरपुर में बसे एक परिवार का आँगन, जहाँ सफलता की गलतियाँ माफ़ हैं, लेकिन भक्ति अपराध बन जाती है। छोटा बेटा अभिषेक शर्मा पूजा में शांति खोजता है, पर तुलना, तानों और उपेक्षा के बीच धीरे-धीरे टूटने लगता है। जब घर ही सहारा नहीं बनता, तो गलत लोग उसका फ़ायदा उठाते हैं और वह अंधेरे की ओर बढ़ जाता है। लेकिन माँ भवानी की कृपा और एक अनाथ लड़की काव्या जिसने उसके टूटते जीवन में नया रास्ता दिखाया, उसकी ज़िंदगी में उम्मीद और दिशा की किरण बन जाती है। कलियुगी आँगन आज के उस समाज का आईना है जहाँ गलत सही बन जाता है और सही को सज़ा मिलती है।
यह उपन्यास पूछता है।
क्या भक्ति कमजोरी है? या सहने की सबसे बड़ी ताक़त?