गाँव का नाम था रामनगर। न बहुत बड़ा, न बहुत छोटा। एक पुरानी नदी उसके किनारे किनारे बहती थी, जिसका नाम था सुरसती। नदी के इस पार खेत थे, हरे भरे, और उस पार बसा था बाज़ार, जिसे लोग "बड़ा बाज़ार" कहते थे, हालाँकि उसमें मुश्किल से पचास साठ दुकानें रही होंगी। पर गाँव वालों के लिए यही बाज़ार दुनिया था। यहीं से अनाज खरीदा जाता, यहीं से कपड़ा, यहीं से नमक तेल, और यहीं से रोज़ की सब्ज़ी।
इसी बाज़ार के बीचोंबीच, एक बड़ी और पुरानी दुकान थी, "लाला रामेश्वरदास एंड संस, सब्ज़ी एवं अनाज भंडार।" यह दुकान तीन पीढ़ियों से चली आ रही थी। लाला रामेश्वरदास के दादा ने इसकी नींव रखी थी, पिता ने इसे बढ़ाया, और अब लाला रामेश्वरदास स्वयं इसे सँभाल रहे थे। उनका बेटा मनोहर भी अब जवान हो चुका था और दुकान के काम में हाथ बँटाने लगा था।
लाला रामेश्वरदास साठ के आसपास के व्यक्ति थे। दाढ़ी में सफेदी झलकने लगी थी, पर आँखों में अभी भी वही चमक थी जो एक कुशल व्यापारी की पहचान होती है। वे हिसाब किताब के धनी थे, पर दिल के भी उतने ही उदार। गाँव में उनकी इज़्ज़त थी, और यह इज़्ज़त सिर्फ़ पैसे की वजह से नहीं थी।