'मुक्त से स्मृति तक' महज एक उपन्यास नहीं बल्कि यह स्मृतियों के उस गहरे और दमघोंटू संग्रहालय की एक रूहानी यात्रा है जहाँ एक प्रेमी अपनी खोई हुई मोहब्बत के हर एक कतरे को डिजिटल फाइलों और बाइनरी कोड्स में संजोने की जिद में स्वयं को ही विस्मृत कर बैठता है। सम्राट सिंह ने इस रचना में उस पीड़ा का गहरा विवरण प्रस्तुत किया है जहाँ नायक अपनी प्रेमिका की हंसी के एक-एक डेसीबल को समय की दीमकों से बचाने के लिए एक डेटा एंट्री ऑपरेटर की भांति दिन-रात एक कर देता है मगर अंततः उसे यह बोध होता है कि प्रेम को कैद करने की हर कोशिश उसे उसकी वास्तविक रूह से दूर ले जा रही है। यह कहानी अद्वैत के उस जटिल दर्शन को विरह की अग्नि में तपाकर एक नवीन स्वरूप प्रदान करती है जहाँ प्रेम केवल स्मृतियों का एक भारी-भरकम संचय मात्र नहीं रह जाता बल्कि रूपांतरित होकर रूह पर पड़ी उस दरार की भांति बन जाता है जहाँ से अस्तित्व का वास्तविक प्रकाश भीतर प्रवेश करता है।
इस उपन्यास का हर एक पृष्ठ उस महासंग्राम का साक्षी है जिसमें नायक अपने डिजिटल ब्रह्मांड को महज पाँच सौ रुपये में त्यागकर उस स्टेशन की पटरियों, पीले रुमाल और एक गुब्बारे के पीछे भागते बच्चे के निश्छल आनंद में अ