मानव समाज को विकसित, प्रगतिशील और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण कहा जाता है। लेकिन जब हम अपने अतीत और वर्तमान के कुछ अंधेरे कोनों में झांकते हैं, तो कई ऐसे स्याह सच सामने आते हैं जो इस सभ्यता के चेहरे पर धब्बे बनकर उभरते हैं। देवदासी प्रथा भी ऐसा ही एक सच है, एक ऐसी कुप्रथा जो सदियों से स्त्रियों की स्वतंत्रता, गरिमा और इंसानियत का हनन करती आ रही है ।
अर्पिता एक देवदासी, केवल अर्पिता की कहानी नहीं है । यह उन अनगिनत स्त्रियों की आवाज़ है जिन्हें परम्पराओं, पितृसत्ता, मिथकों और इतिहास ने हाशिये पर रखा, पर जिन्होंने साहस से अपने अस्तित्व को पुनः लिखा। "देवदासी" एक शब्द, जो कभी श्रद्धा का प्रतीक माना जाता था, समय के साथ शोषण और पीड़ा का पर्याय बन गया । परंतु हर अंधकार के भीतर एक दीपक जन्म लेता है । अर्पिता उसी दीपक का नाम है।
इस उपन्यास को लिखते समय मेरे मन में बार-बार एक प्रश्न उठता रहा, क्या समाज सच में बदलता है, या केवल चेहरे बदलते हैं ? क्या परंपरा के नाम पर अन्याय को अनंत काल तक ढोया जा सकता है ? और सबसे बड़ा प्रश्न क्या एक स्त्री का संघर्ष केवल उसका निजी संघर्ष है, या वह पूरे समाज के आत्मसम्मान की लड़ाई है ?
अर्पिता का जीवन हमें यह सिखाता है